Thursday, July 25, 2013

गुमराह

अब पता बताने वाले ही गुमराह कर जाते हैं
एक पीपल का पेड़, और उसके किनारे एक छोटी सी गली ढूँढने आये थे हम 
पर यहाँ हालत कुछ ऐसे बिगड़े की 
अब रस्ते और दुकानों की एक जंजीर
हमे लापता कर जाती है!

कहाँ गए वह पेड़, कहाँ गए उनपर वह झूले
कहाँ गए उनपर बना उन पंछियों का घरोंदा
अब कहीं पीपल, और कहाँ है उसकी छाओं
कहाँ है वह गलियां, कहाँ हैं वह आस पास दौड़ते छोटे छोटे पाँव!

अब तो कतारें हैं बहुत सी गाड़ियों की
कुछ कुचले फूलों की, कुछ बेजान झाड़ियों की
कौन जाने अब कभी वह दिन फिर लौट के आएंगे
की हम इस बेजान दुनिया से यूँ ही रुक्सत पाएंगे!

[Note: The first para of the poem is written by me; the next two paras were added by my friend Puja Narula Nagpal.]

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